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क्या है मोदी सरकार के आरक्षण का सच “सिर्फ आरक्षण का लोभ और नौकरिया (00) है”

January 17th, 2019 at 9:33 am by Anmol Gupta

केंद्र सरकार ने समानता देने की कोशिश का दावा करते हुए जनरल वर्ग के आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है.

सूत्र बताते है ये सिर्फ चुनावी आरक्षण है नौकरिया तो मोदी सरकार के पास है ही नहीं कहा जाता है कि दलितों को आरक्षण मिलने से उन्हें सरकारी नौकरियों में ज्यादा अवसर मिलते हैं और उनकी भागीदारी काफी ज्यादा होती है. हालांकि, जमीनी स्तर पर हकीकत अलग है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये सच है कि आरक्षण से पिछड़े ही पिछड़े भर गए हैं? क्या ये सच हैकि आरक्षण से दलित ही दलित भर गए हैं?

हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में इन सवालों के जवाब सामने आए. दरअसल, आरटीआई में मिली जानकारी सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण के सिद्धांत से काफी अलग है. देखें क्या कहते हैं आंकड़े…

 

 

 

केंद्रीय नौकरियों का क्या है हाल?

– रेलवे में कुल 16381 पद हैं, जिसमें 1319 (8.05%) पिछड़े और 11273 (68.72%) सवर्ण कर्मचारी हैं.

– 71 विभागों में कुल 343777 पद हैं, जिसमें 51384 (14.94%) पिछड़े और 216408 (62.95%) सवर्ण कर्मचारी हैं.

– मानव संसाधन विकास मंत्रालय में कुल 665 पद हैं, जिसमें 56 (8.42%) पिछड़े और 440 (66.17%) सवर्ण कर्मचारी हैं.

– कैबिनेट सचिवालय में कुल 162 पद हैं, जिसमें 15 (9.26%) पिछड़े और 130 (80.25%) सवर्ण कर्मचारी हैं.

– राष्ट्रपति सचिवालय में कुल 130 पद हैं, जिसमें 10 (7.69%) पिछड़े और 97 (74.62%) सवर्ण कर्मचारी हैं.

इस जानकारी के अनुसार, सवर्णों के अधिकतम 50 फीसद होने का सारा हिसाब उलटा हो जाता है और पिछड़ों के न्यूनतम 27.5 फीसद होने का हिसाब भी सही नहीं बैठता. वहीं, 1 अप्रैल 2018 तक भारत के किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के किसी भी विभाग में 28 साल के आरक्षण के बादभी पिछड़ी जाति का एक भी प्रोफेसर और पिछड़े वर्ग का असोसिएट प्रोफेसर नहीं था. वहीं, असिस्टेंट प्रोफेसर आरक्षित सीट से आधे ही हैं.

आंकड़ों से पता चलता है कि नियमों के अनुसार तय पदों पर ही आरक्षित उम्मीदवारों की नियुक्ति नहीं हो पाई है और जनरल वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति अधिकतम सीमा से भी ज्यादा है.

Anmol Gupta January 17, 2019 9:33 am

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