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बड़ी न्यूज़ मोदी सरकार ने बेरोजगारी के आंकड़े छिपाने के लिए,क्या दो बड़े अफसरों को इस्तीफा दिलवा दिया ??

January 30th, 2019 at 9:19 am by Anmol Gupta

एक नया समाचार मोदी के खिलाफ,क्या मोदी सरकार देश में रोजगार के आंकड़े छिपाने की कोशिश कर रही है? क्या सरकार ये सच सामने नहीं आने देना चाहती कि नोटबंदी से कितने लोग बेरोजगार हुए? क्या सरकार राष्ट्रीय सैंपल सर्वे कार्यालय यानी NSSO के कामकाज में दखल दे रही है? और क्या मोदी सरकार राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग यानी NSC को तवज्जो नहीं देती? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो अचानक से सुर्खियों में आ गए हैं. इसकी वजह है NSC के कार्यवाहक अध्यक्ष पीसी मोहनन और आयोग की सदस्य जेवी मीनाक्षी का इस्तीफा.

पीसी मोहनन वरिष्ठ सांख्यिकीविद और जेवी मीनाक्षी दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में प्रोफेसर हैं. मोहनन ने अपना इस्तीफा 28 जनवरी, 2019 को सरकार को भेज दिया. दोनों को जून, 2017 में तीन साल के लिए NSC का सदस्य नियुक्त किया गया था. इनका कार्यकाल जून, 2020 तक था. मगर इससे पहले ही दोनों सदस्यों ने सरकार को इस्तीफे सौंप दिए. क्या है ये पूरा मामला आइए समझते हैं?

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक साल 2017-18 के जॉब सर्वे में रोजगार के आंकड़े अच्छे नहीं आए हैं. इसलिए सरकार इन आंकड़ों को जारी नहीं करना चाहती.  पहले पांच साल में एक बार रोजगार या बेरोजगारी का सर्वे करता था. पिछला सर्वे साल 2011-12 में किया गया था. इस लिहाज से अगला सर्वे साल 2016-17 में आ जाना चाहिए था. मगर ऐसा नहीं हुआ. फिर सोच-विचार के बाद NSC ने सालाना सर्वे कराने का फैसला किया. जुलाई, 2017 से जून, 2018 के बीच कराए गए NSSO के पहले सालाना सर्वे में नोटबंदी से पहले के और उसके बाद के आंकड़े भी शामिल किए गए. माना जा रहा है कि ये आंकड़े सरकार की सिरदर्दी बढ़ाने वाले हो सकते हैं. इसीलिए इनको जारी करने को लेकर हीलाहवाली की जा रही है.

पीसी मोहनन और जेवी मीनाक्षी ने इसी का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया. मोहनन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ‘NSSO अपने नतीजों को NSC के सामने रखता है. ये एक सामान्य परंपरा है. आयोग से अनुमोदन मिलने के बाद रिपोर्ट अगले कुछ दिनों में जारी कर दी जाती है. आयोग ने NSSO के बेरोजगारी के आंकड़ों को दिसंबर 20018 में ही मंजूरी दे दी थी. तब से दो महीने बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.’

मोहनन के मुताबिक, ‘उन्होंने ये नोटिस किया कि सरकार NSC के काम को गंभीरता से नहीं ले रही है. बड़े फैसले लेते समय भी NSC को अंधेरे में रखा गया. हम असरदार ढंग से अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं कर पा रहे थे.’ माना जा रहा है कि तीन साल पहले जीडीपी आधारित डेटा को अंतिम रूप देने में भी नीति आयोग ने सांख्यिकी आयोग को किनारे कर दिया था. तब से इस आयोग के वजूद पर ही सवाल खड़े होने लगे थे. मतलब ये कि जिस आयोग को सरकार ने डेटा की नीतियां बनाने और उनकी निगरानी के लिए गठित किया. इस सरकार में उसकी कोई पूछ नहीं बची थी. आखिर में इसके दो स्वतंत्र सदस्यों को अपने पद छोड़ने पड़े. अब आयोग में दो ही लोग हैं और वो भी पदेन सदस्य के तौर पर काम करते हैं.

Anmol Gupta January 30, 2019 9:19 am

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